इतिहास

कलिंजर किले का इतिहास

Written by Vinod Pant

दोस्तों क्या आप जानते है की कलिंजर किले का इतिहास क्या है , और ये किला इतना प्रसिद्ध क्यों है . अगर आप कलिंजर किले के इतिहास के बारे में जानते है तो ये अच्छी बात है . अगर आप कलिंजर किले के इतिहास के बारें में नहीं जानते हैं  तो आज कलिंजर किले के इतिहास के बारे अनेक महत्वपूर्ण जानकारी देंगे .

कलिंजर किला

कलिंजर किला

कलिंजर किला भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बांदा में स्थित है यह शहर वर्ल्ड हेरिटेज साईट और मंदिरों के शहर  खुजराहो पास ही स्थित है. ये एक प्रचीन किला है . इस किले की स्थापना 7 वी शताब्दी  में केदार  राजा ने की थी . लेकिन इस किले की पहचान चंदेल शाशको के शासन काल में हुयी थी. ये किला विंध्याचल की पहाड़ी पर 800 फीट की ऊंचाई पर स्थित है .

कलिंजर किले का इतिहास

ये किला एक ऐहासिक किला है . कई पौराणिक घटनाएं इस किले से जुडी हुई  है . इस किले में नीलकंठ का मंदिर भी है जहाँ खजाने का रहस्य भी छुपा हुआ है . इस किले का जिक्र हमारे वेदों में भी मिलता है . कहा जाता है की यही पर महादेव ने विष को पिया था और  काल की गति को मात दी थी .

इस किले में जो नीलकंठ का मंदिर है इसी मंदिर के ठीक पीछे तरफ पहाड़ को काटकर पानी का कुंड बनाया गया है . इस किले में मोटे – मोटे  स्तंभों और दीवारों पर  प्राचीनकालीन प्रतिलिपि बनी हुई है . माना जाता है की इस किले में प्राचीन कालीन खजाने का रहस्य भी छुपा हुआ है . लकिन इसका आज तक कोइ पता नहीं लगा पाया है .  इस किले के अन्दर जो नीलकंठ  का मंदिर है उसके उप्पर एक पहाड़ है जहाँ से पानी गिरता रहता है . माना जाता है की कितना भी सुखा पड़ जायें इस पहाड़ से पानी गिरना बंद नहीं होता है .  माना जाता है की इस पहाड़ से पानी सैकड़ो वर्षो से गिरता आ रहा है और सभी इतिहासकारो  के लिए ये एक अबूझ कहानी है . इस किले के अन्दर और भी बहुत रोचक स्थान है जिसके बारें में हम आपको नीचे बता रहे है .

सप्त द्वार

  1. कलिंजर किले जिसे की भारत का एक प्रमुख ऐतिहासिक स्थल माना जाता है  इस किले में सात द्वारो से प्रवेश किया जा सकता है . इस किले में पहले द्वार को सिंह द्वार कहा जाता है यही इस किले का मुख्य प्रवेश द्वार भी  है . दुसरे द्वार को गणेश द्वार कहा जाता है . इस ऐतिहासिक किले के तीसरे द्वार को चंडी द्वार कहा जाता है . इस किले के चौथे द्वार को स्वर्गारोहण द्वार या बुद्धगढ़ द्वार भी कहा जाता है . इस द्वार के पास एक जलाशय है  इस जलाशय को भैरवकुंड या गंधी कुंड कहा जाता है . इस किले के पांचवे द्वार को हनुमान द्वार के नाम से जाना जाता है . इस द्वार का निर्माण कलात्मक ढंग से किया गया है.  इस द्वार की कलात्मकता की बात करे तो इस द्वार पर शिल्पकारी, मूर्तियाँ व चंदेल शासकों से सम्बन्धित शिलालेख मिलते है . इन लेखो में मुख्यतः रूप से  कीर्तिवर्मन तथा मदन वर्मन का नाम मिलता है. यहाँ मातृ-पितृ भक्त, श्रवण कुमार का चित्र भी दिखाई देता है. इस किले का छठा द्वार जिसे लाल द्वार के नाम से जाना जाता है. इस द्वार के पिश्चिम में हमीर कुंड स्थित है .  चंदेल शासकों का कला-प्रेम व प्रतिभा यहाँ की दो मूर्तियों से साफ़ झलकती है. इस किले के सातवे और अंतिम द्वार को महादेव द्वार के नाम से भी जाना जाता है .

शिव ने यहां काल की गति को दी थी मात…

इतिहासकारों की माने तो यहाँ भगवान भोलेनाथ ने विष पीकर काल को भी मात दे दी थी . इसी लिए नीलकंठ मंदिर को कलिंजर किले के प्रांगण में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और पूजनीय माना गया है. माना जाता है की इस मंदिर का निर्माण नागों ने करवाया था . इस मंदिर का जिक्र हमें पुराणों में भी मिलता है . मंदिर में एक शिवलिंग भी स्थापित है माना जाता है की ये शिवलिंग भी कई साल पुराना है . नीलकंठ के इस मंदिर के बगल में एक काल भैरव की प्रतिमा भी है , इसी प्रतिमा के बगल में चट्टान को काटकर जलाशय बनाया गया है . इसे स्वर्गारोहण जलाशय भी कहते है . कहा जता है की इस जलाशय में स्नान करने से कुष्ट रोग ख़त्म हो जाता है . ये जलाशय पहाड़ से पूरी तरह से ढका हुवा है.

सीता का विश्राम स्थल

इसी किले के अंदर एक पाषाण द्वारा निर्मित एक शैय्या (बेड) और तकिया (पिलो) है. जिसे  सीता सेज कहते है . कथाओं के अनुसार इसे सीता विश्राम स्थल कहा जाता है .  यही पर तीर्थ यात्रियों के आलेख भी बने हुए है . यही पर एक जलकुंड भी जिसे सीता कुंड कहा जाता है . कहा जाता है की इस पुरे किले के अन्दर दो कुंड है . जिसमें स्नान करने से चर्म रोग से मुक्ति मिलती है .

चंदेल राजाओं ने यहां 600 साल तक किया शासन

इस किले के साथ अनेक ऐतिहासिक  प्रसंग जुड़े है . 9 वी शताब्दी में ये किला चेंदेल शाशको के अधीन के अधीन हो गया था . और यही से कलिंजर किले का ऐतिहासिक काल शुरू हुआ  . इसके बाद 15 वी शताब्दी तक इस किले पर चंदेल शासको का अधिकार रहा . इतिहासकारों की माने तो इस किले पर चंदेल राजाओं ने सबसे ज्यादा 600 साल तक राज्य किया .विंध्याचल की पहाड़ी पर 800 फीट की ऊंचाई पर स्थित ये किला  इतिहास में जो भी उतार चड़ाव आये  उनका प्रत्यक्ष गवाह है .

कलिंजर किले पर जिन राजवंशी ने शासन किया उनमें  दुष्यंत – शकुंतला के पुत्र भारत का नाम सबसे पहले आता है . इतिहासकारों के माने तो भरत ने चार किले बनवाये जिनमें कलिंजर का किला सबसे महत्वपूर्ण है .

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800 फीट की ऊंचाई पर स्थित है किला

मुगलों के शाशन काल में ये किला बीरबल की जहांगीर था . माना जाता है की इसके बाद ये किला  राजा छात्र साल के अधीन हो गया था . और सन 1800 के बाद ये किला अंग्रेजो के अधीन हो गया था . 1800 फीट के ऊचाई पर स्थित इस किले को घुमने में दो दिन लग जाते है . अगर आप इस किले को बहार से देखे तो ये आपको  एक पहाड़ जैसा लगेगा . लेकिन इस किले के अन्दर जाने पर इसकी खूबसूरती का पता चलता है .

एक समय ऐसा भी था जब कलिंजर का किला चरों तरफ से देवरों से घिरा था . और उस समय इस किले में प्रवेश करने के लिए चार द्वार थे .लकिन अभी के समय में इस किले में तीन  द्वार  कामता द्वार, पन्ना द्वार और रीवा द्वार नाम के सिर्फ तीन दरवाजे ही है . इस किले के अन्दर प्रवेश करने के लिए सात द्वार है .  जो इस  प्रकार है . आलमगीर दरवाजा, गणेश द्वार, चौबुरजी दरवाजा, बुद्ध भद्र दरवाजा, हनुमान द्वार, लाल दरवाजा और बारा दरवाजा   इस सात द्वारो में से आप किसी भी द्वार से किले के अन्दर प्रवेश कर सकते है.

आकर्षण का केंद्र है ये किला

कलिंजर किले की prtimurti

आपको कलिंजर किले के अन्दर प्राचीनकालीन शाशको के द्वारा बनायीं गयी अनेक प्रतिलिपिया दिखायी देंगे .  जो उन शाशको के रचनात्मक कला , अत्यधिक सौन्दर्य बोध एवं धार्मिक उत्साह का परिणाम है. इतिहासकारों की माने तो ये सभी शाशक भगबान शिव के  बड़े भक्त थे . लेकिन इन शाशको ने यहाँ भगवान् शिव के आलावा अन्य देवी – देवताओं के मंदिर बनाने में भी रूचि दिखायी है . इस किले के दीवारों पर प्राचीन कालीन कलाकारों द्वारा वृहत स्तर की शिल्पकारी कर ढेरों हिन्दू देवी देवताओं आदि के शिल्प  बनाये है .

इस किले के अन्दर ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की त्रिमूर्तिया भी  बनी है . यहाँ से कुछ दुरी पर शेषशायीविष्णु  की  क्षीरसागर स्थित विशाल मूर्ति बनी है। इसके आलावा आपको इस किले के अन्दर अलावा भगवान   शिव,  कामदेव, शचि (इन्द्राणी), आदि की मूर्तियां भी बनी हैं.  इस किले के अन्दर बनी विभिन्न मुर्तिया विभिन्न जातियों और धर्मों से प्रभावित है . इन सब से स्पष्ट हो जता है की  चंदेल संस्कृति में किसी एक क्षेत्र विशेष का योगदान नहीं है . इस किले के अन्दर भगवान् शिव की अनेक मुर्तिया तांडव करते हुए तथा माता पारवती की साथ दीखायी गयी है . इसके आलावा इस किले के अन्दर आकर्षण के रूप में वेंकट बिहारी मन्दिर, दस लाख तीर्थों का फल देने वाला सरोवर, सीता-कुण्ड, पाताल गंगा, आदि हैं.

 कलिंजर किले के निकटवर्ती दर्शनीय स्थल

ऐतिहासिक दृष्टी से इस किले के निकट कई दर्शनीय स्थल है . जो पुरा-पाषाण काल से बुन्देल शासकों के समय तक के हैं. इनमें प्रमुख रूप से रौलीगोंडा, मईफ़ा, बिल्हरियामठ, ऋषियन, शेरपुर श्योढ़ा, रनगढ़, अजयगढ़ आदि है . यहाँ प्राक्रतिक दृष्टि से आकर्षक स्थलों की कोइ कमी नहीं है . इनमें बाणगंगा, व्यासकुण्ड, भरत कूप, पाथरकछार, बृहस्पति कुण्ड, लखनसेहा, किशनसेहा, सकरों एवं मगरमुहा, आदि आते हैं . इन स्थानों में अनेक खनिज एवं विभिन्न वन सम्पदाएं भी मिलती हैं.

कतिकी मेला

कतिका मेला

कार्तिक पूर्णिमा  के दिन कलिंजर किले  में कतिकी मेला लगता है ये मेला अगले पाँच दिनों तक चलता है . इस दोरान यहाँ लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है . ऐसा मन जाता है की ये मेला चंदेल शाशको के शाशन काल से लगता आ रहा है . इस महोत्सव का उल्लेख रिमर्दिदेव के मंत्री एवं नाटककार वत्सराज रचित नाटक रूपक षटकम में मिलता है . उनके शासनकाल में हर वर्ष मंत्री वत्सराज के दो नाटकों का मंचन इसी महोत्सव के अवसर पर किया जाता था.

विश्व धरोहर हेतु प्रयास-

कलिंजर किला भारत का एक ऐतिहासिक स्थल है . और  इस ऐतिहासिक किले की देख – रेख का कार्य राज्य सरकार द्वारा उचित ढंग से नहीं हो पा रहा है . भारत के पुरातात्त्विक सर्वेक्षण विभाग की बजट में कमी के कारण इस स्थल की देख – रेख के लिए पर्याप्त धनराशी जमा नहीं हो पा रही है . अखिल भारतीय बुंदेलखं विकाश मंच के प्रयासों से इसे  युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित करने हेतु अथक प्रयास किये जा रहे है . युनेस्को द्वारा कलिंजर किले को विश्व धरोहर स्थल घोषित करने के इस प्रयास में अब  पुरातत्व विभाग भी जुड़ गया है .यहाँ पर्यटकों के आवक में वृद्धि होने से क्षेत्र में रोजगार के साधन भी बड गए है  . यहाँ सालभर में लगभग दो – तीन लाख पर्यटक आने की सम्भावना बनी रहती है . जिस कारण इस क्षेत्र  के विकाश में भी तेजी  आई है

आवागमन

बस मार्ग

कालिंजर की भौगोलिक स्थिति दक्षिण-पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बुन्देलखण्ड क्षेत्र के बाँदा जिले से दक्षिण पूर्व दिशा में जिला मुख्यालय, बाँदा शहर से पचपन किलो मीटर की दूरी पर है. बाँदा शहर से बस द्वारा बारास्ता गिरवाँ, नरौनी, कालिंजर पहुँचा जा सकता है. कालिंजर प्रसिद्ध विश्व धरोहर स्थल एवं पर्यटक स्थली – खजुराहो से 105 किमी दूरी पर है। यहाँ से चित्रकूट 78 किमी (48 मील), बांदा 62 किमी (31 मील) एवं इलाहाबाद 205(127मील) है.

रेल मार्ग

रेल मार्ग के द्वारा कलिंजर पहुँचने के लिए अर्तरा रेलवे स्टेशन है. जो झांसी-बांदा-इलाहाबाद रेल लाइन पर पड़ता है। यहाँ से कलिन्जर 36 किमी (22 मील) की दूरी पर है। यह स्टेशन बांदा रेलवे स्टेशन से 57 किमी (35 मील) की दूरी पर स्थित है.

वायु मार्ग

वायुमार्ग से आने के लिये कलिन्जर से 130 किलोमीटर (81 मील) दूर खजुराहो विमानक्षेत्र पर वायु सेवा उपलब्ध है

आज हमने आपको कलिंजर किले के इतिहास के बारें में अनेक जानकारियां दी – जैसे – कलिंजर किला कहां स्थित है , कलिंजर किले का इतिहास क्या है , कलिंजर किले के अन्दर कौन – कौन से रमणीय स्थल है आदि   दोस्तों अब तो आपको कलिंजर किले के बारें में अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ हो गयी हुंगी .

हम आशा करते है की आज आपने जो भी जानकारी हासिल की उस जानकारी को आप अपने तक सिमित नहीं रखे बल्कि उसे दूसरों तक भी पहुचाएं .

 

 

 

 

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