जीवन परिचय

जगदीश चन्द्र बोस का जीवन परिचय एवं इतिहास

जगदीश चन्द्र बोस का जीवन परिचय एवं इतिहास
Written by Vinod Pant

जगदीश चन्द्र बोस का जीवन परिचय एवं इतिहास

जीवन परिचय

जगदीश चन्द्र बोस का जीवन परिचय एवं इतिहास – जगदीश चन्द्र बोस का जन्म बांग्ला देश में ढाका जिले के फरीदपुर के मेमनसिंह में हुवा था. उनके पिता का नाम भगवान् चन्द्र बोस और माता का नाम बामा सुंदरी बोस था . जगदीश चन्द्र बोस के पिता ब्रह्म समाज के नेता होने के साथ साथ फरीदपुर,वर्धमान अन्य जगहों पर उप-मजिस्ट्रेट(सहायक कमिश्नर ) थे. 11 वर्ष की आयु तक इन्होने गाँव के ही एक विद्यालय में ही शिक्षा ग्रहण की.
बोस की बाकी शिक्षा बांग्ला के विद्यालय में पूरी हुयी.बोस के पिता का मान्ना था कि अंग्रेजी सीखने से पहले उन्हें अपनी मातृभाषा का ज्ञान अच्छे से होना चाहिए. ब्रिटिस भारत में जन्मे बोस ने  मेंजैवियर महाविद्यालय (कलकत्ता) में  सनातास्क की उपाधि हासिल की थी. इसके बाद वो चिकत्सा की शिक्षा ग्रहण करने लंदन विश्वविध्यालय चले गए.लेकिन इन्हें वहा कुछ स्वास्थ समस्याओ का सामना करना पड़ा जिसके चलते इन्हें अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ कर भारत वापस लोंटना पड़ा

भारत लौटने के बाद इन्हुने फिर से प्रेसिडेंसी महाविद्यालय में भोतिकी के प्राध्यापक का पद सभाला लकिन इन्हें वहा जातिगत भेदभाव जैसी  समस्याओ का सामना करना पड़ा और इसके चलते से ने  वहा  बहुत से महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग किये.
बोस को सर जगदीश चन्द्र बोस के नाम से भी जाना था. इन्हे बहुशास्त्र ज्ञानी, भौतिक शास्त्री,जीवविज्ञानी,वान्स्पतिविज्ञानी,पुरातात्विक साथ ही वैज्ञानिक कथा लिखने वाले लेखक भी माना जाता है . वे ब्रिटिस कालीन भारत में सबसे पहले रेडयो और सूक्ष्म तरंगो की प्रकाशिकी पर कार्य करने वाले वैज्ञानिक भी माने जाते है . वनस्पति विज्ञान में भी उन्होने काफी खोजे की है . बोस को भारत का पहला वैज्ञानिक शोधकर्ता भी मान जाता है. वे भारत के पहले ऐसे वैज्ञानिक भी जिन्हे पहली बार एक अमरीकन पेटेंट मिला था. उन्हे रेडियो विज्ञानं का पिता भी मन जाता है.

जगदीश बसु द्वारा रेडियो की खोज

ब्रिटिस के एक सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी जेम्स क्लर्क मैक्सवेल  ने गणितीय रूप से विविध तरंग धैर्य के विद्युत चुम्बकीय तरंगो के अस्तित्व की  भविष्य वाणी की थी. लेकिन उनकी भाविस्य्वानी के सत्यापन से पहले 1879 में  उनकी मृत्यु हो  गयी .

इसके बाद 1887,88 me इन चुम्बकीय तरंगो के अस्तित्व सर जगीश चन्द्र बोस  को सोपा बोस का अनुसन्धान का पहला उल्लेखनीय पहलू यह था की  उन्हने चुम्बकीय तरंगो के तरंग दैर्ध्य को मिलीमीटर स्तर पर ला दिया (लगभग 5 मिमी तरंग दैर्ध्य)। वो प्रकाश के गुणों के अध्यन के लिए लंबी तरंग दैर्ध्य  की प्रकाश तरगो के नुक्सान की समझ गए .

इसके बाद 1895  के सार्वजनिक प्रदर्शन के दोरान  बोस ने एक मिलीमीटर रेंज माइक्रोवेव तरंग का  उपयोग बारूद दुरी पर प्रजवलित करने और घंटी बजने में किया था. बोस के इस प्रदर्शन को लेफ्टिनेंट गवर्नर सर विलियम मैकेंजी ने कोलकाता के  टाउन हाल में देखा .

रेडियो डेवलपमेंट में स्थान

बोस ने अपने प्रयोग उस समय किये जब रेडियो एक सम्पर्क माध्यम के तौर उभर रहा था. बोस ने  रेडियो माइक्रोवेव ऑप्टिक्स पर जो काम किया वो रेडयो काम्पुनिकेसन से जुड़ा हुवा नहीं था  लकिन बोस ने रेडियो माइक्रोवेव ऑप्टिक्स पर तो तथ्य लिखे और सुधार किये उन्हने दुसरे रेडयो  आविष्कारो को काफी हद तक प्रभावित किया .

जगदीश चन्द्र बासु पहले ऐसे विज्ञानिक थे जिन्होने रेडियो तरंगो को डिटेक्ट करने के लिए सेमी कन्डक्टर जंक्सन का इसेमाल किया था . ओर इस पद्यति में  कई माइक्रोवेव कंपोनेंट्स की खोज की थी. लेकिन इसके बाद मिलीमीटर लम्बाई  की इलेक्ट्रॉनिक तरंगो पर अगले 50  साल तक कोई खोज नहीं हुयी.

इसके बाद बोस ने लंदन में 1817 में रॉयल इंस्टीटूशन में अपने मिलीमीटर तरंगो पर किये हुए शोध की वर्णना दी थी। p टाइप और n टाइप के सेमी  कंडक्टरो का पूर्व अनुमान भी  बोस ने पहले ही लगा लिया था .

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बोस का वनस्पति जगत पर अनुसंधान

बायोफिजिक्स (Biophysics ) के  क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा योगदान ये था की, उनका मान्ना  था की पोधो में उत्तेतना का संचार वैद्युतिक (इलेक्ट्रिकल ) माध्यम से होता हैं. न की केमिकल माध्यम से.  बाद उन्होंने इन दावो को वेज्ञानिक माध्यम से सिद्ध करके दिखाया था . बोस ने सबसे पहले माइक्रोवेव के वनस्पति के टिश्यू पर होने वाले असर का अध्ययन किया था। इसके साथ हे उन्हने पौधो पर बदलते मोसम के अनुसार होने वाले असर का अध्यन तथा इन्हिबिटर्स (inhibitors ) का पौधों पर असर और बदलते हुए तापमान से होने वाले पौधों पर असर का भी अध्ययन किया था.

मेटल फटीग और कोशिकाओ की प्रतिक्रिया का अध्ययन

बोस ने अलग _ अलग धातुओ और पौधो के टिसू पर फटिक रिस्पोंस का भी तुलनात्मक अध्यन किया था .उन्हने अलग _अलग धातुओ जैसे _इलेक्ट्रिकल, मकेनिकल,रासायनिक को थर्मल तरीके के मिश्रण से उत्तेजित किया था . और धातु और कोशिकाओ  में प्रतिक्रियाओ की जो समानता थी उन्हें नोट किया था. बोस के इस प्रयोग से ये सिद्ध हुवा था की simulated (नकली) कोशिकाओ और धातु में चक्रीय(cyclical ) फटीग प्रतिक्रिया भी होती है । इसके साथ ही जीवित कोशिकाओ और धातुओ में अलग अलग तरह के उत्तेजनाओं (stimuli ) के लिए विशेष चक्रीय (cyclical )फटीग और रिकवरी रिस्पांस का भी जगदीश चन्द्र बोस ने अध्ययन किया था .

जगदीश चन्द्र बोस “को नाइट”  (Knight) की उपाधी सन 1917  में मिल गयी थी . इसके साथ ही उन्हें शीघ्र ही  रॉयल सोसाइटी  लंदन में भोतिक तथा जीव विज्ञान का फैलो चुन लिया गया .बोस लंदन में शीघ्र  ही एक अच्छी प्रयोशाला खोलने की सोच रहे थे . क्योकि उन्होने  अपना शोध कार्य एक ऐसे प्रयोगशाला में किया था जहाँ कोइ महंगे उपकरण नहीं थे. लंदन में “बोस इंस्टीट्यूट” (बोस विज्ञान मंदिर) इसी  सोच का परिणाम है . जो की आज विज्ञान में शोध कार्य के लिये राष्ट्र का एक प्रसिद्ध केंद्र हैं .

आज हमने आपको सर जगदीश चेन्द्र बोस के  इतिहास एवं जीवन परिचय के बारे में बताया ,बोस ने किन _किन  चीजो के खोज की थी,  उन्होंने  कितने शोध कार्य किये थे ,तथा उनके कितने शोध कार्य सफल हुए थे ,उन्हें नाइट की उपाधि किस शोध के लिए दियी गयी थी . आदि के बारे  में अनेक महतवपूर्ण जानकारीयां दी .

अंतिम राय

हमे आशा है की आज आपको सर जगदीश चन्द्र के बारे जो भी जानकारी दी  आपको वो जानकारी अवश्य पसंद आयी होगी .आज आपको जो भी जानकारी दी गयी उससे आपने बहुत कुछ सिखा होगा . हम आपसे आशा करते है की आज आपने जो जानकारी हासिल की वो जानकारी  आप अपने तक ही सीमित नहीं रखे बल्कि उसे दुसरो तक भी  पहुचाये .  जिस्से दुसरे लोग भी इस जानकारी को हासिल कर सके .

 

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Vinod Pant

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