जीवन परिचय

तुलसीदास के दोहे

तुलसी दास जी कहना चाहते है कि  दया घर्म से उत्पन्न होती है  अभिमान तो केवल पाप को उत्पन्न करती है
Written by Jagdish Pant

दोहा: ” दया घर्म का मूल है पाप मूल अभिमान,

           तुलसी दया ना छोडिये जब तक घट में प्राण.

अर्थ:- तुलसी दास जी कहना चाहते है कि  दया घर्म से उत्पन्न होती है  अभिमान तो केवल पाप को उत्पन्न करती है और जब तक  मनुष्य जिन्दा है तब तक मनुष्य को दया भावना नहीं छोडनी चाहिए|

दोहा :- “सरनागत कहूँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि,

              ते नर पावॅर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि.” 

अर्थ:- तुलसी दास जी कहना चाहते है की जो व्यक्ति अनहोनी का अनुमान लगाकर  शरण मे आये हुए व्यक्ति का त्याग कर देता  हैं वह पाप और क्षुद्र होता है  उन्हेंने देखना भी अनुचित होता है|

दोहा :- “तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ और,

             बसीकरण इक मंत्र हैं परिहरु बचन कठोर.”

अर्थ:- तुलसी दास जी कहना चाहते है की आच्छे बोल सब और सुख का विस्तर करता है इसलिए किसी को अपने वंश में करने का एक  मन्त्र है इसलिए मनुष्य को कठोर बोल छोड़ कर अच्छे बोल बोलने का प्रयास करना चहिए

दोहा :- “सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस,

                राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास.”

अर्थ:- तुलसी दास जी कहना चाहते है की यदि  मंत्री गुरु और वैद्य, यदि  ये  तीन भय और लाभ की बात करते है  तो  घर्म राज्य और शरीर तीनों  का विनाश होना  निशचित है

दोहा :- रम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार

          तुलसी भीतर बाहेर हूँ जौं चाहसि उजिआर.”

अर्थ:- तुलसी दास जी कहना चाहते है की यदि  व्यक्ति अन्दर और बहार दोनु तरफ  उजाला चाहता है| तो उसे मुह के अन्दर जीभ रूपी दहलीज पर राम  रूपी मणिदीप  की स्थापना करनी चाहिए|

दोहा :- “मुखिया मुखु सो चाहिये खान पान कहूँ एक,

              पालड़ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक.”

अर्थ:- तुलसी दास जी कहना चाहते है की हमारा मुखया मुह के समान होना चाहिए क्योंकि वह खाना पीना तो अकेला खाता है  और विवेक से हमारे शारीर के  सभी अंगो  का लालन पोषण करती है

दोहा :- “नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु.

               जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास.”

अर्थ:- तुलसी दास जी कहना चाहते है की राम का नाम  कल्पतरु (मनचाहा वरदान देने वाला) और कल्याण का निवास (मुक्ति का दवार) है जो भी व्यक्ति इसका  स्मरण करता है और तुलसीदास भी तुलसी के समान पवित्र हो गये

दोहा :- “सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानी,

                सो पछिताई अघाइ उर अवसि होई हित हानि.”

अर्थ:- तुलसी दास जी कहना चाहते है की जो स्वाभाविक चाहने वाले दुनीया मे कुछ  ही लोग होती है जैसी की गुरु और स्वामी की सिख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदय में खूब पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती हैं.

दोहे :- “बिना तेज के पुरुष की अवशि अवज्ञा होय,

           आगि बुझे ज्यों राख की आप छुवै सब कोय.”

अर्थ:- तुलसी दास जी कहना चाहते है की तेजहीन का कोई मान समान नही होता और उसकी बात का महत्व नही देना है  ठीक उसी  तरह  जब राख की आग बुझ जाती हैं, तो उसे हर कोई पूछने  लगता है.

दोहा :-“ तुलसी साथी विपत्ति के विद्या विनय विवेक,

              साहस सुकृति सुसत्यव्रत राम भरोसे एक.

अर्थ:- तुलसी दास जी कहना चाहते है की जो मुश्किल समय मे साथ देती है वह है ज्ञान, विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म और आच्छे कर्म, भगवान का नाम आदि

दोहा :- “तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर,

            सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि.

अर्थ:- तुलसी दास जी कहना चाहते है की सुन्दर मोर को देखकर मुर्ख अथवा बुदिमान वक्ति भी धोखा खा जाते है सुंदर मोर को  देख लो  वचन तो अमृत के समान हैं लेकिन आहार साप का  करता है|

दोहा :-  काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान 

तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान||

अर्थ :- तुलसी दास जी कहना चाहते है की जब तक मनुष्य के मन में  काम, गुस्सा, अहंकार, और लालच से  भरे हुए होते है तो एक बुदिमान मनुष्य और मुर्ख मनुष्य मे कोई अन्तर नही है

दोहा :- करम प्रधान विस्व करि राखा,

          जो जस करई सो तस फलु चाखा

अर्थ :- तुलसी दास जी कहना चाहते है की भगवान ने इस घरती मे कर्म करने के लिए भेजा है अर्थात् आप जैसे कर्म करोगे वैसी ही फल पाओगे

दोहा :- सुख हरसहिं जड़ दुख विलखाहीं, दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं
           धीरज धरहुं विवेक विचारी, छाड़ि सोच सकल हितकारी

अर्थ :- तुलसी दास जी कहना चाहते है की मुर्ख आदमी दुःख के समय शोक मनता है और सुख के समय मे अत्यत विकुल हो जाता है और बुदिमान व्यक्ति सुख और दुःख मे एक  समान होता है और मुश्किल से मुश्किल समय मे अपना धैर्य नही खोता है

दोहा:- “तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग,
           सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग,

अर्थ :- तुलसी दास जी कहना चाहते है की इस संसार मे विभिन्न प्रकार के लोग रहते है और सभी लोगों को प्यार महोब्बत से रहना चाहिए उदाहरण के लिए एक नौका नदी में एक किनारे से   दुसरे किनारे प्यार से  सफर करती है

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Jagdish Pant

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