जीवन परिचय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जीवनी | Pandit Deendayal Upadhyay Biography in Hindi

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जीवनी
Written by Jagdish Pant

दीनदयाल उपाध्याय भारत के महान नेताओं में से एक है पंडित दीनदयाल उपाध्याय  भारतीय जनता पार्टी के महान नेता थे साथ ही महान राष्ट्र नायक भी थे आज हम आपको पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन के बारे में महत्वपूर्ण बाते बताने वाले है

दीनदयाल उपाध्याय का प्रारम्भिक जीवन | Early life and education of Pandit Deendayal Upadhyay

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को मथुरा जिले के एक गाँव में हुआ था उनके पिता का नाम श्री भगवती प्रसाद उपाध्याय तथा मां का नाम रामप्यारी था और छोटे भाई का नाम शिवदयाल उपाध्याय था. दीनदयाल को बचपन से ही कई आघातों का सामना करना पड़ा जब वह 3 साल के थे तो उसके पिता की मृत्यु हो गई थी और जब वह 19 साल के थे तो थोड़ो थोड़ो अंतराल के बाद माता , नाना , छोटे भाई और नानी की भी मृत्यु हो गई थी इसके बाद उनकी देखभाल उनके मामा मामी ने की

दीनदयाल उपाध्यान का युवा जीवन | Joined RSS and Jana Sangh

जब दीनदयाल उपाध्याय बी.ए.  की पढाई के लिए 1937 में कानपुर आए तो उनकी मुलाक़ात  राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ से हो गई कुछ समय बाद उन्हें आभास होने लगा की उनको जीवन का लक्ष्य मिल गया 1942 में जब उन्होंने संघ कार्य में पूरा जीवन व्यतीत करने का मन बनाया तो उनकी मामी ने उन्हें शादी करने का आग्रह किया
तब उन्होंने मामीजी के लिए एक पत्र लिखा और कहा की  समाज की उन्नति के बिना व्यक्ति का विकास असम्भव है | यदि कुछ व्यक्ति समाज में उन्नत हो भी गये तो क्या लाभ ? आज समाज को हमारे जीवन की अपेक्षा है हमे इस अपेक्षा को पूरा करना होगा जिस समाज की रक्षा के लिए कृष्ण ने कई संकटों का सामना किया | , राम ने वनवास सहा  , राणा प्रताप जंगल में रहे , शिवाजी ने अपने जीवन की बाजी लगा दी , रानी झांसी ने बलिदान दिया क्या हम उसकी खातिर अपने जीवन की आकान्शाओ का त्याग नही कर सकते है ?
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जीवनी

दीनदयाल संघ प्रचारक के रूप मे | As Pracharak

राष्ट्र के प्रति अपने यही  उद्दत विचारो को लेकर वह 1942 में वह संघ के प्रमुख प्रचारक बन गए मात्र तीन वर्ष में अपनी कर्मठता ,निष्ठा ,समर्पण भाव और सन्घठन कौशल के कारण उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे विशाल प्रदेश में सह-प्रांत प्रचारक की जिम्मेदारी सौंपी गई
दिसम्बर 1952 में भारतीय जनसंघ  का कानपुर में अधिवेशन हुआ जिसमे श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रधान पद पर ताजपोश हुई और वही पंडित दीनदयाल उपाध्याय को संघठन का  पहला  महासचिव नियुक्त किया गया

जनसंघ देश का एक बड़ा दल और पार्टी पधान के रूप में दीनदयाल

दीनदयाल ने अपने सहयोगी  नेताओं और कार्यकताओं को इतना सक्रिय बनाया की लोकसभा के 1957 , 1962 और 1967 के चुनावों के बाद वह देश का दूसरा सबसे बड़ा दल बनकर उभरा बल्कि 1967 में उत्तर प्रदेश के 9 राज्यों में बने गैर कांग्रेसी सरकारों में महत्वपूर्ण योगदान दिया

आर.एस.एस. के साथ उनका सम्बन्ध

दीनदयाल अपने प्रारम्भिक जीवन में समाज सेवा के प्रति अत्यधिक समर्पित थे 1937 में अपने काँलेज के दिनों में वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के साथ जुड़े उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पादक डॉ. हेडगेवार से बातचीत की और संगठन के प्रति पूरी तरह से अपने आपको समर्पित कर दिया सन 1942 में काँलेज की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने ना तो नौकरी करने का प्रयास किया ना तो विवाह के प्रति सोचा बल्कि संघ की शिक्षा का प्रशिक्षण प्राप्त करने नागपुर चले गए

एक लेखक के रूप में

दीनदयाल उपाध्याय के अंदर पत्रकारिता का भी गुण था उन्होंने लखनऊ से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ में सन  1940 के दशक में कार्य किया अपने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकाल के दौरान उन्होंने एक साप्ताहिक समाचार पत्र ‘पांचजन्य’ और एक दैनिक समाचार पत्र ‘स्वदेश’ में काम करना शुरू किया उन्होंने ‘चंद्रगुप्त मौर्य’ और शंकराचार्य की जीवनी हिंदी में लिखी उन्होंने  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के संस्थापक डॉ. के.बी. हेडगेवार की जीवनी का मराठी से हिंदी में अनुवाद किया

भारतीय लोकतंत्र और समाज के प्रति उनका विचार 

दीनदयाल उपाध्याय की अवधारणा थी कि आजादी के बाद भारत के विकास का आधार भारतीय संस्कृति हो न की अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गयी पश्चिमी विचारधारा हालाकि भारत में लोकतंत्र आजादी के तुरंत बाद स्थापित हो गया था दीनदयाल उपाध्याय का विचार था की लोकतन्त्र भारत का जन्म सिद्ध अधिकार न की पश्चिम (अंग्रेजों) का एक उपहार उन्होंने इस बात पर भी बल दिया की सरकार को कर्मचारियों और मजदूरों की समस्याओं का भी समाधान करना चाहिए

दीनदयाल उपाध्याय से जुड़े विवाद

स्टेशन का नाम बदलने से जुड़ा विवाद

जिस मुग़ल  सराय रेलवे स्टेशन पर उनका शव मिला था उस स्टेशन का नाम बदलकर उनके नाम रखने का प्रस्ताव हाल ही में पेश किया गया कई पार्टियों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया लेकिन लाख विरोध के बावजूद  मुग़ल  सराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय

निधन

19 दिसंबर 1967 को दीनदयाल उपाध्याय को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अध्यक्ष चुना गया 11 फरवरी 1968 की सुबह मुग़ल सराय रेलवे स्टेशन पर दीनदयाल का निष्प्राण शरीर मिला इस को सुनकर पूरा देश दुःख में डूब गया पंडित दीनदयाल उपाध्याय को  श्रद्धांजलि देने के लिए राजेंद्र प्रसाद मार्ग पर भीड़ उमड़ पड़ी.  12 फरवरी, 1968 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई द्वारा श्रद्धांजलि देने आए
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अंतिम राय

दोस्तों आज हमने आपको पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जीवनी | Pandit Deendayal Upadhyay Biography in Hindi , दीनदयाल उपाध्याय का प्रारम्भिक जीवन | Early life and education of Pandit Deendayal Upadhyay , दीनदयाल संघ प्रचारक के रूप मे | As Pracharak , भारतीय लोकतंत्र और समाज के प्रति उनका विचार तो आपको पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन के बारे में अधिक से अधिक जानकरी मिली होगी
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