जीवन परिचय

भारतेंदु हरिशचंद्र की जीवनी

भारतेंदु हरिशचंद्र की जीवनी
Written by Vinod Pant

दोस्तों क्या आप भारतेंदु हरीशचन्द्र के बारें में जानते है . आप जानतें है की ये कौन थे . अगर आप भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारें में जानते है तो ये अच्छी बात है अगर आप भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारें में नहीं जानतें है तो आज हम आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी के  बारें में अनेक महत्वपूर्ण बातें बताएँगे.

भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के साथ हिंदी साहित्य के भी जनक माने जाते है . उनका नाम एक ऐसे लेखको में भी प्रसिद्ध है जिन्होंने आधुनिक भारत में अपना काफी प्रभाव छोड़ा है . भारतेंदु हरिश्चंद्र बहुत सारे  नाटको के लेखक रहने के साथ साथ एक सम्मानित कवी भी रह चुके है . अपने कार्यो में उन्होंने सामाजिक राय के लिए रिपोर्ट, पब्लिकेशन, ट्रांसलेशन और मीडिया जैसे सभी उपकरणों का उपयोग किया था.

भारतेंदु हरिशचंद्र की जीवनी

नाम- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
जन्म- 9 सितम्बर 1850
जन्म स्थान- वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
पिता का नाम- गोपाल चंद्र
कार्यक्षेत्र- साहित्यकार
भाषा- हिंदी
काल- आधुनिक काल
मृत्यु- 6 जनवरी 1883
मृत्यु स्थान- वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म सन  9 सितंबर सन 1850 को वाराणसी के एक  एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ था.  इसके पिता का नाम गोपाल चन्द्र  था .इनके पिता एक कवी  थे .इनके पिता का नाम गोपाल दास था लेकिन इनके पिता अपना वास्तविक नाम न लिख कर अपना नाम गिरधर दास लिखते थे . भारतेंदु हरिश्चंद्र  जब युवा अवस्था में थे उस समय इनके माता – पिता का देहांत हो गया . और बाल्या काल में ही भारतेंदु हरिश्चंद्र माता – पिता के सुख से वंचित हो गए थे . इसके माता – पिता  के देहांत का  इन पर काफी असर हुवा .  भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती, उर्दू और पंजाबी भाषाएं स्वाध्याय से सीखी . इसके  बाद भारतेंदु हरिश्चंद्र ने  क्वींस कॉलेज में प्रवेश लिया लेकिन वहाँ इनका मन नहीं लगा भारतेन्दु जी ने अंग्रेजी शिक्षा की दीक्षा राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द के घर जाकर ग्रहण की थी . भारतेंदु हरीशचन्द्र को काव्य प्रतिभा अपने पिता से विरासत में मिली थी . कहा जता है की जब भारतेंदु हरिश्चंद्र मात्र 5 साल के थे तब इन्होने अपने  पिता को एक दोहे की रचना करके उस दोहे   को सुनाया था और इसके पिता ने इन्हें सुप्रसिद्ध कवी होने का आशीर्वाद दिया था .

आपको बता दें की भारतेंदु हरीशचन्द्र ने अपना सारा जीवन हिन्दी साहित्य के विकाश में व्यतीत किया था . लेखक, देशभक्त और आधुनिक कवी के रूप में उन्हें पहचान दिलाने के उद्देश्य से काशी के विद्वानों ने सन 1980 में एक सामाजिक मीटिंग में हरीश चन्द्र को भारतेंदु की उपाधि से सम्मानित किया था . और तभी से हरीश चन्द्र का नाम भारतेंदु हरीशचन्द्र पड़ा .

प्रसिद्ध साहित्यिक आलोचक राम विलास शर्मा ने  भी भारतेंदु हरिश्चंद्र को साहित्य का सबसे प्रभावशाली और आधुनिक हिन्दी साहित्य का जनक बताया है .

आपको बता दें की जर्नलिज्म, ड्रामा और कवी के क्षेत्र में भी भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था , सन 1868 में हरीश चन्द्र ने कवी वचन सुधा जैसी पत्रिका  को   सम्पादित किया  था .  और सन 1873 में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने  पत्रिका और बाल बोधनी में  देश के  लोगों से स्वदेसी  वस्तुओ को अपनाने  की प्राथना की थी . इसके बाद  भारतेंदु हरिश्चंद्र  ने  सन 1874 में देश के लोगों को देश में बने उत्पाद का उपयोग करते हुए स्वदेसी अपनाओ का नारा दिया था . सन 1883 में भारतेंदु हरीश चन्द्र को  भारत  में हिन्दी साहित्य के विकाश के लिए मिनिस्ट्री ऑफ़ इनफार्मेशन एंड ब्राडकास्टिंग  अवार्ड  मिला .

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साहित्यिक परिचय

दोस्तों अब तो आप भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी के बारें में जान गए होंगे . अब हम आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र के साहित्यिक जीवन के बारें में बतातें है .

भारतेंदु हरिश्चंद्र का आधुनिक हिन्दी साहित्य में बहुत बड़ा योगदान रहा है . यही कारण है की सन 1857 से सन 1900 ईo तक के इस काल को भारतेंदु काल के नाम से जाना जाता है . जब भारतेंदु हरीशचन्द्र मात्र 18 साल के थे तब उन्होंने सन 1868 में कवि वचन सुधा’ नामक पत्रिका का सम्पादन किया था . और उसके आठ अंक निकलने के पश्चात इसका नाम ‘हरिशचंद्र चंद्रिका’ हो गया.

कृतियां

मौलिक नाटक-

वैदेही हिंसा हिंसा न भवति (1873), सत्य हरिश्चन्द्र (1817), श्रीचंद्रावली (1876), विषस्य निषमौषधम (1876), भारत दुर्दशा (1880), नीलदेवी (1881), अंधेरी नगरी (1881) .

काव्य कृतियां-

भक्त सर्वस्व, प्रेम मालिका (1871), प्रेम माधुरी (1875), प्रेम तरंग (1877), प्रेम प्रलाप (1877), होली (1879), मधुमुकुल (1881), प्रेम फुलवारी (1883), सुमनांजलि, फूलों का गुच्छा (1882), कृष्ण चरित्र (1883) .

निबंध संग्रह –

भारतेन्दु ग्रंथावली में संकलित है | सुलोचना, मदालसा, लीलावती, परिहास वंचक, दिल्ली दरबार दर्पण .

यात्रा वृत्तान्त –

सरयू पार की यात्रा, लखनऊ की यात्रा

जीवनी-

सूरदास, जयदेव, महात्मा मोहम्मद

इतिहास-

अग्रवालों की उत्पत्ति, महाराष्ट्र देश का इतिहास तथा कश्मीर कुसुम

भाषा शैली-

भावात्मक शैली, व्यंगात्मक शैली, उद्द्धोन शैली, अलंकार शैली

रस-

इन्होंने अपने साहित्य में श्रृंगार वह हास्य रस का उत्कृष्ट प्रयोग किया है

छन्द-

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने अपने काव्य में चौपाई, रोला, सोरठा, सवैया आदि छन्दों का प्रयोग किया है | अलंकार- इन्होंने अपने काव्य में अनुप्रास अलंकार, उपमा अलंकार, उत्प्रेक्षा अलंकार, रूपक अलंकार और सन्देह अलंकारों का प्रयोग किए हैं .

आज हमने आपको आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी के बारें में बताया . तो दोस्तों अब आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी के बारें में जानकारियाँ हो गयी होगी .

हम आशा करते है की आज हमने आपको भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी के बारें में जो कुछ बताया उससे आपने बहुत कुछ सिख लिया होगा . आज आपने हमारे इस आर्टिकल के माध्यम से भारतेंदु हरीशचन्द्र की जीवनी के बारें में जो भी महत्वपूर्ण बातें सीखी उसे आप अपने तक ही सिमित नहीं रखे बल्कि उसे दूसरों तक भी पहुचाएं . जिससे दुसरे लोग भी भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारें में जान सके .

 

 

 

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Vinod Pant

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