जीवन परिचय

महान संतकवि मलूक दास का जीवन परिचय

महान संतकवि मलूक दास का जीवन परिचय
Written by Jagdish Pant

दोस्तों आज हम आपको महान संतकवि मलूक दास का जीवन परिचय के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देने वाले हैं वह भारत के महान संत कवि माने जाते है मलूक दास ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज को जागरूक बनाने का प्रयन्त किया| आज हम आपको मलूक दास के जीवन और दोहों के बारे में अधिक से अधिक जानकरी देने का प्रयास करेंगे

महान संतकवि मलूक दास का जीवन परिचय

मलूक दास का पुराना नाम मल्लु था उनका जन्म 1631 में  कड़ा (जिo इलाहाबाद) में हुआ था मलूक दास  के तीन भाई थे

  • हरिश्चंद्र,
  • शृंगार
  • रामचंद्र

मलूक दास किसी भी जाति या धर्म के व्यक्तियों के साथ भेदभाव नही करते थे वह सभी को एक नजर से देखते थे | इसी कारण ने मुग़ल सम्राट औरंगजेब भी उन्हें बहुत मानते और उनका समान करते थे|  वह अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों को कहते थे की भगवान एक ही है इस कारण से मलूक दास के माता पिता उन्हें पसंद नहीं करते थे

मलूक दास की विश्व में बहुत ही ख्याति थी | लोग उनसे मिलने के लिए बहुत दूर से आते थे उन्होंने अध्यात्मिक क्षेत्र में बहुत  काम किया हैं और उनकी अनके कविताएँ हैं जिन्हें आज भी लोग बहुत पसन्द करते  हैं

“जाती पाती पूछे नाही कोई,
हरी को भजे सो हरी का होई”

मलूक दास जी कहना चाहते है की भगवान के दरवान में जाति धर्म नही होता है जो भगवान का नाम लेते हैं  भगवान उन्ही के नही हो जाते और भगवान सभी के लिए एक समान होते हैं

मलूक दास ने अध्यात्म के क्षेत्र में बहुत योगदान दिया हैं  उन्होंने भगवान की अनुभूति की है मलूक दास महान संत थे उन्होंने कभी भी अपने भक्तों के बीच भेदभाव नही किया| उनके अनेक शिष्य मुस्लिम भी थे

महान संतकवि मलूक दास की रचनाएँ

मलूक दास ने अनेक रचनाए हैं जो आज भी लोगो के बीच बहुत ही लोकप्रिय हैं और यह निन्म लिखित हैं

  • अलखबानी
  • गुरुप्रताप
  • ज्ञानबोध
  • पुरुषविलास
  • भगत बच्छावली
  • भगत विरुदावल
  • रतनखान
  • रामावतार लीला
  • साखी
  • सुखसागर
  •  दसरत्न
  • रत्नखान,
  • भक्ति विवेक

महान संतकवि मलूक दास का जीवन परिचय

मलूक दास अपने उपदेशो के लिए बहुत ही विख्यात थे उनके उपदेशों का प्रचार उत्तर प्रदेश के प्रयाग, लखनऊ आदि से लेकर पश्चिम की ओर जयपुर, गुजरात, काबुल आदि तक तथा पूरब और उत्तर की ओर पटना एवं नेपाल तक होता था  मलूक दास ने फारसी, अवधी, अरबी, खड़ी बोली में अनेक रचनाएँ की

मलूक दास की रचनाएँ में दो प्रसिद्ध रचनाएँ ‘रत्नखान’ और ‘ज्ञानबोध हैं  दिग्दर्शन मात्र के लिए कुछ पद्य नीचे दिए  हैं 

अब तो अजपा जपु मन मेरे।
सुर नर असुर टहलुआ जाके मुनि गंधर्व हैं जाके चेरे।
दस औतारि देखि मत भूलौ ऐसे रूप घनेरे
अलख पुरुष के हाथ बिकाने जब तैं नैननि हेरे।
कह मलूक तू चेत अचेता काल न आवै नेरे
नाम हमारा खाक है, हम खाकी बंदे।
खाकहि से पैदा किए अति गाफिल गंदे
कबहुँ न करते बंदगी, दुनिया में भूले।
आसमान को ताकते, घोड़े चढ़ फूले
सबहिन के हम सबै हमारे । जीव जंतु मोहि लगैं पियारे
तीनों लोक हमारी माया । अंत कतहुँ से कोइ नहिं पाया
छत्तिस पवन हमारी जाति । हमहीं दिन औ हमहीं राति
हमहीं तरवरकीट पतंगा । हमहीं दुर्गा हमहीं गंगा
हमहीं मुल्ला हमहीं क़ाज़ी। तीरथ बरत हमारी बाजी
हमहीं दसरथ हमहीं राम । हमरै क्रोध औ हमरै काम
हमहीं रावन हमहीं कंस । हमहीं मारा अपना बंस

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महान संतकवि मलूक दास के पद

  • हरि समान दाता कोउ नाहीं / मलूकदास
  • अब तेरी सरन आयो राम / मलूकदास
  • कौन मिलावै जोगिया हो / मलूकदास
  • ना वह रीझै जप तप कीन्हे / मलूकदास
  • दरद-दिवाने बावरे / मलूकदास
  • नाम हमारा खाक है / मलूकदास
  • तेरा, मैं दीदार-दीवाना / मलूकदास
  • हमसे जनि लागै तू माया / मलूकदास
  • गरब न कीजै बावरे / मलूकदास
  • सदा सोहागिन नारि सो / मलूकदास
  • राम कहो राम कहो / मलूकदास
  • दीनदयाल सुनी जबतें / मलूकदास
  • दया धरम हिरदे बसै, बोलै अमरित बैन / मलूकदास
  • अब तो अजपा जपु मन मेरे / मलूकदास
  • कबहूँ न करते बंदगी / मलूकदास
  • साँचा तू गोपाल / मलूकदास
  • ऐ अजीज ईमान तू / मलूकदास
  • दीनबन्धु दीनानाथ / मलूकदास

मलूकदास के दोहे

भेष फकीरी जे करें, मन नहिं आवै हाथ ।
दिल फकीर जे हो रहे, साहेब तिनके साथ ॥

 

जो तेरे घर प्रेम है, तो कहि कहि न सुनाव ।
अंतर्जामी जानिहै, अंतरगत का भाव ॥

 

हरी डारि ना तोड़िए, लागै छूरा बान ।
दास मलूका यों कहै, अपना-सा जिव जान ॥

 

दया-धर्म हिरदै बसे, बोले अमरत बैन ।
तेई ऊँचे जानिए, जिनके नीचे नैन ॥

 

जो तेरे घर प्रेम है, तो कहि कहि न सुनाव ।
अंतर्जामी जानिहै, अंतरगत का भाव ॥

 

हरी डारि ना तोड़िए, लागै छूरा बान ।
दास मलूका यों कहै, अपना-सा जिव जान ॥

 

दया-धर्म हिरदै बसे, बोले अमरत बैन ।
तेई ऊँचे जानिए, जिनके नीचे नैन ॥

 

सुंदर देही देखि कै, उपजत है अनुराग।
मढ़ी न होती चाम की, तो जीवन खाते काग।।

 

प्रभुता ही को सब मरै, प्रभु को मरै न कोय।
जो कोई प्रभु को मरै, तो प्रभुता दासी होय।।

 

सुमिरन ऐसा कीजिए, दूजा लखै न कोय।
ओंठ न फरकत देखिये, प्रेम राखिये गोय।।

महान संतकवि मलूक दास की मृत्यु 

मलूक दास की मृत्यु 1682 सन् में हुई थी  आज भी वृंदावन में वंशीवट क्षेत्र में संत मलूकदास की समाधि है।

अंतिम राय

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