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मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य

मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य
Written by Vinod Pant

आज कल “शिक्षा का अधिकार ” , सूचना का अधिकार ” तथा “शांति पूर्ण विरोध करने का अधिकार ” का बार-बार प्रयोग किया जाता है .कही बार हमको लगता है की हमारे कई अधिकार है, साथ ही हमें किसी अन्य व्यक्ति या किसी शिक्षक द्वारा बताया जाता है की हमारे अन्य “व्यक्ति, समाज ,राष्ट्र ,मानवता के प्रति कुछ कर्तव्य है . क्या आपने कभी सोचा है की सभी व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों का सामान रूप से प्रयोग करते है या अपने कर्तव्यों का प्रयोग कर रहे हैं ?संभवतः नहीं . परन्तु इस बात से हम सब सहमत हुंगे की कुछ अधिकार ऐसे है जिसका प्रयोग प्रतियेक व्यक्ति को सामान रूप से करना चाहिए . विशेषकर हमारे जिसे लोकतांत्रिक देश में कुछ अधिकार ऐसे है जो प्रतीयेक नागरिक को आवश्यक रूप से प्राप्त होते है . वैसे ही कुछ कर्तव्य ऐसे है जिनका प्रयोग लोकतंत्र के प्रतियेक नागरिक करना होता है . इसी कारण भारत का संविधान नागरिको को कुछ मौलिक अधिकार प्रदान करता है इन्ही अधिकारों को “मौलिक अधिकार ” कहते है . यहाँ हम आपको इन्ही मौलिक अधिकार और कर्तव्यों के बारें में बताएंगे .

Table of Contents

अधिकार तथा कर्तव्यों का अर्थ –

दोस्तों अक्सर हम अधिकारों की बात तो करते है लेकिन क्या आप जानते है की अधिकार शब्द का क्या आर्थ है . अधिकार लोगों के बीच पारस्परिक संबंध और क्रिया के नियम है . ये राज्य और व्यक्ति अथवा समूह के कार्यों पर कुछ सीमाएं और दायित्व लागतें है .

अधिकार किसी व्यक्ति द्वारा आपेक्षित अधिकार है जो स्वयं के व्यक्तित्व के विकाश के लिए आवश्यक है तथा समाज और राज्य द्वारा प्रप्त है अधिकार स्वतंत्रता या हकदारी के कानूनी अथवा सामाजिक अथवा नैतिक सिधांत है , क़ानूनी व्यवस्था ,सामाजिक परम्परा अथवा नैतिक सिधान्तों के अनुसार अधिकार मुलभुत आदर्श नियम है जो लोगों को कुछ पाने या करने का अधिकार देते है . अधिकार सामान्यत: समाज अथवा संस्कृती के आधार स्तंभों के रूप में किसी भी सभ्यता के मूल मने जाते है . परन्तु अधिकारों का वास्तविक आर्थ तभी है जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करते है .

अधिकार तथा कर्तव्यों के एक दुसरे के पूरक बन जाने तथा दोनों के पूरक बन जाने और दोनों का सहि से उपयोग करने से जीवन बहुत ही आसान बन जाता है . अधिकार वो है जो हम अपने लिए दुसरे के द्वारा किये जानेकी आशा रखते है , जबकि कर्तव्य वो कार्य है , जो हम दूसरों के प्रति करते है .

इस तरह अधिकार दूसरों के सम्मान करने के दायित्वों के साथ मिलतें ही . ये दायित्व जो अधिकारों के साथ जुड़े होते है ,कर्तव्य कहलाते है . यदि हम यातायात अथवा स्वास्थ जैसी सार्वजनिक सेवाओं का उपयोग का अधिकार रखते है तो यह हमारा कतर्व्य है कि दुसरे व्यक्ति सार्वजनिक सेवाओं के उपयोग का अधिकार रखते हैं तो यह हमारा कर्तव्य है की दुसरे व्यक्ति भी इन सेवाओं का उपयोग का सकें| यदि हमें स्वतंत्रता का अधिकार है तो हमारा यग कर्तव्य भी की हम इसका दुरूपयोग न करें तथा दूसरों को किसी तरह की हानि का पहुचायें

मैलिक अधिकार

जैसी की हम देखते है किसी व्ही व्यक्ति के जीवन के लिए तथा विकास के लिए अधिकारों का होना आवश्यक है इस अर्थ में अधिकारों की एक लम्बी सूची होगी| जबकि ये सब अघिकार समाज द्वारा पहचाने जाता है इसमें से कुछ अति महत्वपूर्ण अधिकारों को राज्य द्वारा मान्यता दी गयी है तथा सविधान में स्थान दिया गया है| ऐसे अधिकारों को मैलिक अधिकार कहते हिया या दो कारणों से मैलिक अधिकार कहे जाते हैं प्रथम यस सविधान में उल्लिखित है जनकी सविधान गारंटी देता है और दूसरा या न्याय योग्य है अथार्त न्यायालयों द्वारा बाध्यकारी है न्याय योग्य होने का अर्थ है डी इन अधिकारों का हनन होने पर व्यक्ति इनकी रक्षा के लिए न्यायायल में जा सकता है यदि सरकार द्वारा कोई ऐसा कानून बनाया जाता है जो इनको सीमित करता है तो न्यायालय उस कानून को अमान्य कर देते हैं

भारतीय सविधान के खण्ड 3 में ऐसे अधिकारों का प्रावधान है सविधान भारतीय नागरिकों को 6 मैलिक अधिकार प्रदान करता है ये हैं

  1. समानता का अधिकार
  2. स्वतंत्रता का अधिकार
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
  5. संस्कृति एवं शिक्षा सम्बन्धी अधिकार
  6. सवैधानिक उपचारों का अधिकार

हालाकि ये मैलिक अधिकार सार्वभैमिक है सविधान में इनके कुछ अपवाद और प्रतिबन्ध की दिए गये हैं

क्या आप जानतें है ?

मूल सविंधान में साथ मौलिक अधिकार दी गये है . उप्पर दिए गये अधिकारों के अलावा मूल संबिधान में संपत्ति का अधिकार भी दिया गया है . चूकी इस अधिकार की वजह से समाजवाद और संपत्ति के न्याय संगात वितरण के लक्ष्य को प्राप्त करने में अनेक समस्याएं आ रही थी अत: 1978 में 44 सविधान शंशोधन द्वारा द्वारा इसे मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया . हालांकि इसे हटायें जाने का ये अर्थ नहीं है की हम संपत्ति अर्जित करने , रखने और बेचने का अधिकार नहीं रखते है . नागरिको का ये भी अधिकार है . लकिन अब ये मौलिक अधिकार न होकर क़ानूनी अधिकार मात्र है .

1. समानता का अधिकार

आज के समय में हमारे जैसे समाज केलिए समानता का अधिकार बहुत जरुरी है . इस अधिकार का उद्देश्य कानून का शाशन स्थापित करना है . जहाँ कानून के समक्ष सभी नागरिकों के साथ समानता का व्यवहार किया जाता है .. भारत में सभी लोगों को कानून का संरक्षण तथा कानून के समक्ष समानता उपलब्ध कराने के लिए पांच प्रावधान( अनुच्छेद 14-6) किये गये है . साथ ही यह धर्म , नस्ल , जाति , या जन्मस्थान के आधार पर किसी भेदभाव पर रोक लगाता है

  • क़ानून के समक्ष समानता- संविधान यह सुनिश्चित करता है की सभी नागरिक क़ानूनी के समक्ष समान होंगे| इसका तात्पर्य है की देश के कानूनों द्वारा सभी को समान संरक्षण मिलेगा| कोई भी कानून से ऊपर नहीं है इसका अर्थ है की यदि को व्यक्ति एक प्रकार का अपराध करते हैं तो उन्हें बिना किसी भेदभाद के समान दंड मिलेगा धर्म,मूलवंश,जाति ,लिंग या जन्म स्थान के आधार पर कोइ भेद भाव नहीं –
  • राज्य या धर्म , जाति ,नस्ल ,लिंग ,जन्मस्थान के आधार पर किसी के साथ भेद -भाव नहीं करेगा .ये सामाजिक समानता के लिए जरुरी है .. भारत के प्रत्येक नागरिक की दुकान ,जलपान गृह तथा सार्वजानिक स्थानों पर सामान की पहुच होगी तथा वह कुओ,तालाबो अथवा सड़को का प्रयोग बिना किसी भेद भाव के कर सकेगा .

छुआछूत का उन्मूलन:

किसी प्रकार के छुआछूत कोकानुं के अंतर्गत दण्डनीय बनाया गया है . यह प्रावधान ऐसे लाखो भारतीय की सामाजिक स्थिति को उप्पर उठाने के लिए किया गया प्रयास है जो जातीय व्यवसाय के कारण दूर रहे है. परन्तु यह वास्तव में बहुत दुभार्ग्यपूर्ण है की सवैधानिक प्रावधानों के बावजूद भी यह सामाजिक बुराई आज भी बनी हुई हैं एक नर्स द्वारा एक मरीज की देखभाल, माँ द्वारा अपने बच्चे की सफाई तथा एक औरत द्वारा टॉयलेट की सफाई करने में आप कोई अंतर पाते है टॉयलेट साफ करने को लोग बुरी निगाह से क्यों देखते है

उपधियों का उन्मूलन:

व्रिटिश शासन के प्रति निष्ठावान रहने वाले व्यक्तियों को डी जाने वाली सर या राय बाहदुर जैसी सभी उपाधियों का अंत कर दिया गया है क्योकि यह सब क्रत्रिम अंतर पैदा करते थे हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्र की उत्तम सेवा करने वालीं को भारत के राष्ट्रपति द्वारा नागरिक और सैन्य पुरस्कार दिये जाते है नागरिक पुरस्कारों के रूप में भारत रन्त पद्म विभूषण , पद्म भूषण था पद्म श्री एंव सैन्य पुरस्कार जैसे वीर चक्र , प्र्मव्री चक्र अशोक चक्र आदि प्रदान किये जाते हैं |

2. स्वतंत्रता का अधिकार –

हम सब इस बात से सहमत हुंगे की स्वतन्त्रता हम सब प्राणियों की सबसे महत्वपूर्ण इच्छा होती है . मानव जाति के लिए निश्चित रूप से स्वतंत्रता आपेक्षित होती है . भारत के संविधान में सभी नागरिकों को स्वतंत्रता का धिकार दिया गया है . ये अधिकार अनुच्छेद 19 से लेकर अनुच्छेद 22 में सम्मलित है अधिकारों की निम्न चार श्रेणिया है .

1- छ: स्वन्त्र्तायें-

संबिधान के अनुच्छेद 19 में निम्न छ: स्वतंत्रताए दियी गयी है –

  • विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • शांति पूर्वक और बिना किसी हथियार के सभा आयर सम्मलेन करने की अनुमति
  • संघ और संगठन बनाने की स्वतंत्रता
  • भारत के राज्य क्षेत्र में आबध भ्रमण की स्वतंत्रता
  • भारत के राज्य क्षेत्र में कीड़ी भाग में निवास करने और बस जाने की स्वतंत्रता
  • कोइ वृत्ति ,आजीविका ,व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता

उपयुक्त स्वतंत्रताओ का उद्देश्य लोकतंत्र के लिए समुचित वातावरण बनाये रखना है .

2-अपराधों के लिए दोषसिद्ध के सम्बन्ध में संरक्षण –

संबिधान के अनुच्छेद 20 में अपराधों के दोष सिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण दिया गया है . कोइ व्यक्ति अपराधों के लिए तब तक दोषसिद्ध नहीं ठहराया जा सकता है , जब तक की उसे कोइ ऐसा कार्य करने के समय ,जो अपराध के रूप में आरोपित है , किसी प्रवत्त विधि का अतिक्रमण नहीं किया है या वह उससे अधिक शास्ति का भागी नहीं होगा , जो उस अपराध के किये जाने के समय प्रवत्त विधि के अधीन आरोपित किया जा सकती थी . किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए अधिक अभियोजित और दण्डित नहीं किया जायेगा .

3-प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण

जैसा की संविधान के अनुच्छेद 21 में दिया गया है की किसी व्यक्ति को , उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार से वंचित किया जायेगा अन्यथा नहीं .

कुछ दशओं में गरिफ्तरी और निरोध के संरक्षण –

जैसा की संविधान के अनुच्छेद 22 में दिया गया है की किसी भी व्यक्ति को ,जो गरिफ्तार किया गया है , ऐसी गिरफ़्तारी के कारणों से यथाशीघ्र अवगत कराये बिना अभिरक्षा प्रतिरुद्ध नहीं रखा जायेग या अपनी रूचि के विधि व्यवसायी से परामर्श और प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जायेगा , प्रत्येक व्यक्ति को जिसे ग्रिफ्तार किया गया है और अभिरक्षा के निरुद्ध रखा गया है , गिरप्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यालय तक के यात्रा के लिए , आवश्यक समय को छोड़कर ऐसी गिरफ़्तारी के 24 घंटे के अवव्धि में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जायेगा और ऐसे किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना उक्त अवधि से अधिक अवधि के लिए अभिरक्षा के निरुद्ध नहीं रखा जायेगा .

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार –

क्या आपने कभी सोचा है की हमारे समाज में कितनी तरह से शोषण किया जाता है? आपने छोटा बच्चे को चाय की दूकान पर काम करते हुए देखा होगा या गरीब और निरक्षर व्यकियों को अमीर लोगों के घरों में जबरदस्ती काम कराते हुए देखा होगा| पारम्परिक रूप से भारतीय समाज श्रेणियों में विभाजित रहा हैं जो शोषण को कई रूपों में प्रोत्साहित करता रहा है| भारतीय सविंधान में शोषण के विरुद्र प्रावधान दिये गये हैं सविधान के अनुच्छेद २३ तथा अमुच्चेद 24 में शेषन के विरुद्र अधिकारों को दिया गया हों या प्रावधान निम्न हैं

मानव के दुव्यर्पार तथा बलात श्रम का प्रतिषेध- मानव के दुव्यर्पार और बेगार तथा इसी प्रकार अन्य बलात श्रम को प्रतिशिद्र किया गया है और इस उपबन्ध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा जो विधि के अमुसार दंडनीय होगा

पूर्व में विशेषतौरपर सामन्तवादी भारतीय समाज में गरीब तबकों तथा पददलित वर्गो के व्यक्ति जमीन्दारों तथा अन्य बलशाली लोगों के लिए मुफ्त में काम करते थे इस तरह का चलन बेगार या बलात श्रम कहलाता है

कारखानों आदि में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबध – जैसा कि संविधान में दिया गया है चौदह वर्ष से कम आय के किसी बच्चे को किसी कारखाने या खान में काम पर नहीं लगाया जायेगा या किसी अन्य जोखिम भरे नियोजन में नहीं लगाया जाएगा| इस अधिकार का उद्देश्य भारत में योगों से च रहे बाल श्रम जैसी प्रमुख गंभीर समस्या से छुथ्कारा पाना है बच्चे समाज की परिसम्पत्ति हैं| खुशहाल बचपन तह शिक्षा प्राप्त करना उनका आधारभूत अधिकार हैं जैसा की निचे चित्र में दिखाया गया है तथा आपने भी देखा होगा की सवैधानिक प्रावधानों के बावजूद अनेक स्थानों पर बालश्रम की समस्या आज भी देखी जा रही है | इस दुर्भावना को इसके विरोध में जनमत के आधार पर ही दुआर किया जा सकता है

4. धार्मिक स्वतंत्रता काअधिकार –

जैसा की आप लोग जानते है की , प्रस्तावना के एक उदेश्य के रूप में , नागरिकों के लिये विशवास ,धर्म तथा उपासना की स्वतंत्रता प्राप्त करने ‘ की घोषणा की गयी है . चुकि भारत में अनेक धर्म है , जहां हिन्दू ,मुस्लिम , सिख ,इसाई तथा अन्य समुदाय साथ -साथ रहते है . संबिधान में भारत को ‘पंथनिरपेक्ष राज्य’ घोषित किया गया है . इसका अर्थ ये है की भारत राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है . परन्तु नागरिको को अपनी पसंद से किसी भी धर्म को मानने और पूज करने और की स्वतंत्रता डी गयई है . धार्मिक स्वतंत्रता के सम्बन्ध में संविधान के अनुच्छेद 25-28 में उपबंध किये गये है .

  • अन्त:करण की स्वतंत्रता और धर्म को आबाद रूप से मानने ,आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता –

सभी व्यक्तियों को अन्त:करण की स्वतंत्रता और धर्म को आबाध रूप से मानने और आचरण करने और प्रचार कानर का समान अधिकार है , लेकिन इसका ये नतलब नहीं है की बल पूर्वक या लालच देकर किसी व्यक्ति द्वारा दुसरे का धर्म प्रवर्तित कराया जायें . साथ ही , कुछ अमानवीय , गैरकानूनी और अंधविश्वाशी चलन पर रोक लगा डी गयी है

देवी देवताओं तथा किसी आलौकिक शक्तियों को प्रसाद स्वरूप पशुबली या नरबलि जैसे चलन पर रोक लगा दी गयी है इसी तरह सती प्रथा के नाम पर विधवा को पति के शव के साथ ही जिंदा जलाने पर रोक लगा दी गयी है vidhavaon को दूसरी शादी की अनुमति नहीं देना अथवा सिर का मुंडन करना अथवा सफेद कपड़े पहने कर मजबूर करना अन्य सामजिक बुरायी है जो धर्म के नाम पर की जा रही है ऊपर आलेखित प्रतिबंधु के अलावा राज्य के पास धर्म से जुढ़ी हुई आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक अथवा अन्य पंथ निरपेक्ष गतिविधियों को संचालित करने की सक्ति होती है लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य के आधार पर राज्य द्वारा इस अधिकार पर प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं

  • धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता

लोक व्यवस्था सदाचार और स्वस्थ के अधीन रहते हुए प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को

  • धार्मिक और परोपकारी प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और संचालन
  • अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का
  • चल – अचल संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व का
  • ऐसी संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का अधिकार होगा.
  • किसी विशिष्ट धर्मों लो बढावा देने के लिए करो के भुगतान के बारें में स्वतंत्रता

  • किसी भी व्यक्ति को ऐसे करो का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा जिससे से किसी विशिष्ट धर्म या सम्प्रदाय को बढावा देने या किसी संचालन पर व्यय क्सरने के लिए विशेष तौर पर उपयोग किया जाए .
  • कुछ शिक्षा संस्थाओ में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता

  • पूरी तरह राज्य निधि से पोषित किसी शिक्षा संसथान में कोइ धर्मिलक शिक्षा नहीं दी जाएगी .यधपि यह किसी ऐसी शिक्षा में लागु नहीं होगी जिसका प्रशाशन राज्य करता है .किन्तु जो किसी ऐसे न्यास के अधीन स्थापित है  जिसके अनुसार उस संस्था में धार्मिक शिक्षा देना आवश्यक है .
  • परन्तु राज्य से मन्यता प्राप्त राज्य निधि से सहायता पाने वाली शिक्षा संस्था में उपस्थित होने वाले व्यक्ति को किसी ऐसी संस्था में दी  जाने वाले धार्मिक शिक्षा में भाग लेने के लिए या ऐसी संस्था या उससे संलग्न संसथान में की जाने वाली धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के लिए तब तक बाध्य नहीं किया जाएगा , जब तक उस व्यक्ति ने यदि वो नाबालिक है तो उसके संरक्षक ने , इसके लिए अपनी सहमती नहीं दी है .

5-संस्स्कृति और शिक्षा से सम्बंधित अधिकार

भारत संस्कृति ,लिपि ,भाषा एवं धर्मों की विविधता  लिए हुए दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है .जैसा की हम जानते है की लोकतंत्र बहुमत का शासन है , परन्तु इसके सफलता पूर्वक संचालन के लिए अल्पसंख्यक भी सामान रूप से महत्वपूर्ण है , इसलिये अल्पसंख्यकों की भाषा ,संस्कृती और धर्म का संरक्षण भी आवश्यक हो जाता है

ताकि बहुमत के शाशन के प्रभाव में अल्पसंख्यक उपेक्षित और कमजोर महसूस न कर सके , चूकि लोग अपनी भाषा और संस्कृती पर गर्व करते है . इसलिये एक विशेष अधिकार जिसे सांस्क्रतिक तथा शैक्षिक अधिकार के नाम से जाना जाता है , मूलाधिकार अध्याय में सम्मलित किया गया है . अनुच्छेद 29 -30 में इस सम्बन्ध में प्रवधान किये गये है .

  • अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण –

किसी  भी अल्पसंख्यक वर्ग की ,जिसकी अपनी बिशेष भाषा ,लिपि या संस्कृती है ,उसे बनाए रखने का अधिकार होगा .राज्य द्वारा पोषित या राज्य -निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी नागरिक को केवल धर्म ,नस्ल ,जाति ,भाषा या इनमें से किसी के आधार पर वंचित नहीं किया जायेगा .

  • शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशाशन करने का अल्पसंख्यकों वर्गों का अधिकार .

धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी पसंद की शिक्षा संस्थाओ की स्थापना और प्रशाशन का अधिकार होगा . धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा स्थापित और प्रशासित शिक्षा संस्थान की  संपत्ति के अनिवार्य अर्जंके लिए उपबंध करने वाली विधि बनाते समय ,राज्य यह सुनिशित कर ले की ऐसी संपत्ति के अर्जंके लिए ऐसी विधि द्वारा नियत या उसके अधीन अवधारित रकम इतनी हो की उस खंड के प्रत्याभूत अधिकार निर्बन्धित या निराकृत न हो जाए . शिक्षा संस्थानों को सहायता देने में राज्य या किसी शिक्षा संस्था के विरुद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा की वः धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक वर्ग के प्रबंध में है .

6-संवैधानिक उपचारों का अधिकार

चुकि मौलिक अधिकार न्याय योग्य है ,इसी तरह वे प्रत्याभूत है . ये प्रवर्तनीय है . यधि किसी व्यक्ति के मूलाधिकारों का उल्लंघन होता है तो  वो सहायता के लिए न्यालय में जा सकता है .परन्तु वास्तविकता ऐसीनहीं है , हमारे दैनिक जीवन में मूलाधिकारों का अतिक्रमण और उल्लंघन एक विचारणीय विषय बन गया है . यही कारण है की हमारा संविधान विधायिका तथा कार्यपालिका को इन अधिकारों को प्रतिबंधित करने की अनुमति नहीं देता है संविधान हमारे मूलाधिकारों के संरक्षण के लिए कानूनी उपचार प्रदान करता है .अनुछेद 32 के अंतर्गत उल्लेखित उसे सवैधानिक उपचारों का अधिकार कहा जाता है .यदि हमारें मूलाधिकारों का उल्लंधन होता है तो  हम न्यालय द्वारा न्याय की मागं कर सकते है . हम सीधे उच्चतम न्यायलय में भी जा सकते है जो मूलाधिकारों के परिवर्तन के लिए निर्देश ,आदेश या रिट जारी कर सकता है .

शिक्षा का अधिकार –

  • वर्ष 2002 में शिक्षा का अधिकार  86 संविधान शंशोधन द्वारा मूलाधिकारों के अध्याय में एक नया अनुच्छेद 21A क्र रूप में जोड़ा गया . लम्बे समय से इसकी मांग की जा रही थी ,ताकि 6 से 14 वर्षों के सभी बच्चे (और उनके माता -पिता ) मूलाधिकार के रूप में  अनिवार्य और मुप्त शिक्षा का दावा कर सके . देश को निरक्षरता से मुप्त करने की दिशा में उठाया गया कदम एक बहुत बड़ा कदम है . परंतु इसे  जोड़ा जाना अर्थहीन ही रहा ,क्योकि 2009 तक इसे लागू नहीं किया गया . 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम संसद द्वारा पारित किया गया .इस अधिनियम का उद्देश्य 6 से 14 वर्ष के उन सभी बच्चों को जो भारत से बहार है ,उन्हें  स्कूलों तक लाना तथा उन्हें गुणवत्ता युक्त  शिक्षा ,जो की उनका अधिकार है ,सुनिशित करना है .
  • दिल्ली में निवास कर रहे तमिल,कन्नड़ तथा तेलगु बोलने वाले लोग बहुत से अल्पसंख्यक समुदायों में से है .अपनी विशिष्ट भाषा तथा संस्कृति के संरक्षण के लिए क्या कर सकते है
  • सांस्कृतिक तथा शैक्षिक अधिकारों के अंतर्गत निम्न में से कौन से परिस्थितियां नहीं आती है
  1. अपनी विशिष्ट भाषा को संरक्षित करना
  2. अल्पसंख्यकों को निधि उपलब्ध करने में किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाना
  3. अपनी पसंद की संस्था स्थापित करने का अधिकार
  4. अल्पसंख्यकों के विधालयों में बहुसंख्यक समुदाय के बच्चों कों प्रवेश देना चाहिए
  • “संवैधाबिक उपचारों का अधिकार सबसे प्रमुख मूल अधिकार है .” क्या आप इस कथन से सहमत है ?अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिये .

अंतिम राय

दोस्तों आज हमने आपको मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य , मैलिक अधिकार , के  बारे में अधिक से अधिक जानकारी  मिली होगी | आपको यह लेख कैसा लगा  निचे comment कर के जरुर  बताइए अगर अभी भी  कोई सवाल आप पूछना चाहते हो तो निचे Comment Box में जरुर लिखे| और कोई सुझाव देना चाहते हो तो भी जरुर दीजिये| हमारे Blog को अभी तक अगर आप Subscribe नहीं किये हैं तो जरुर Subscribe करें| जय हिंद, जय भारत, धन्यवाद|

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