जीवन परिचय

रामधारी सिंह ‘ दिनकर ‘ जी का जीवन परिचय

रामधारी सिंह ' दिनकर ' जी का जीवन परिचय
Written by Vinod Pant

रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के प्रसिद्ध लेखक, कवी एवं निबंधकार थे | इन्होने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की और साहित्य के रूप में उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेज़ी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। रामधारी सिंह दिनकर एक ओजस्वी राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत कवि के रूप में जाने जाते थे। उनकी कविताओं में छायावादी युग का प्रभाव होने के कारण श्रृंगार के भी प्रमाण मिलते हैं। आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से हिन्दी साहित्य के इन महान कवि रामधारी सिंह ‘ दिनकर ‘ जी का जीवन परिचय के बारे में अनेक महत्वपूर्ण जानकारी देने का प्रयास करेंगे |

रामधारी सिंह ‘ दिनकर ‘ जी का जीवन परिचय –

हिन्दी साहित्य के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर सन 1908 ई. में सिमरिया, ज़िला मुंगेर (बिहार) में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था | इनके पिता का नाम रवि सिंह और माता का नाम मन रूप देवी था | दिनकर के पिता आइक साधारण किसान थे | जब दिनकर की आयु मात्र 2 वर्ष की थी , उस समय इनके पिता रवि सिंह का देहांत हो गया | पिता की मृत्यु के बाद दिनकर और इनके भाई – बहनो का पालन – पोषण इनकी विधवा माता ने किया था | दिनकर का बचपन एक ऐसे स्थान में बीता, जहाँ दूर तक फैले खेतों की हरियाली, बांसों के झुरमुट, आमों के बगीचे और कांस के विस्तार थे। प्रकृति की इस सुषमा का प्रभाव दिनकर के मन में बस गया, और शायद यही कारण था कि दिनकर जी पर वास्तविक जीवन की कठोरताओं का भी अधिक गहरा प्रभाव पड़ा।
दिनकर जी ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के प्राथमिक विद्यालय से संस्कृत के एक पंडित की | इसके बाद दिनकर जी ने अपने निकटवर्ती गाँव में राष्ट्रीय मिडल स्कूल जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था के विरोध में खोला गया था, में प्रवेश प्राप्त किया | यही से दिनकर जी के मस्तिष्क में राष्ट्रियता की भावना का विकाश हुआ | दिनकर जी ने अपने हाईस्कूल की शिक्षा मोकामाघाट हाई स्कूल से प्राप्त की | हाईस्कूल की शिक्षा प्राप्त करने के बाद दिनकर जी का विवाह ही गया था | विवाह के बाद दिनकर जी ने एक पुत्र को जन्म दिया | इसके बाद सन 1928 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद दिनकर जी ने पटना विश्वविद्यालय से 1932 में इतिहास में बी. ए. ऑनर्स कियारामधारी सिंह ‘ दिनकर ‘ जी का करियर –
पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. ऑनर्स करने के बाद अगले ही वर्ष एक स्कूल में दिनकर जी प्रधानाध्यापक के पद पर नियुक्त हो गए |इसके बाद सन 1934 ईo में दिनकर जी ने सरकार के अधीन सब-रजिस्ट्रार का पद संभाल लिया | इस पद पर दिनकर जी ने नौ वर्षों तक काम किया | जब 1947 में हमारा देश आजाद हो गया उसके बाद दिनकर जी बिहार विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रध्यापक व विभागाध्यक्ष नियुक्त होकर मुज़फ़्फ़रपुर पहुँचे| इसके बाद जब सन 1952 ईo में भारत की प्रथम संसद का निर्माण हुआ, तो दिनकर जी को राज्यसभा का सदस्य चुना गया और वह दिल्ली आ गए। दिनकर 12 वर्ष तक संसद-सदस्य रहे, बाद में उन्हें सन 1964 से 1965 ई. तक भागलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। लेकिन अगले ही वर्ष भारत सरकार ने उन्हें 1965 से 1971 ई. तक अपना हिन्दी सलाहकार नियुक्त किया और वह फिर दिल्ली लौट आए|
दिनकर जी द्वारा लिखे गए प्रमुख तीन काव्य संग्रह इस परकार से है – ‘रेणुका’ (1935 ई.), ‘हुंकार’ (1938 ई.) और ‘रसवन्ती’ (1939 ई.) ये काव्य संग्रह दिनकर जी के आरम्भिक आत्म मंथन के युग की रचनाएँ हैं –

रेणुका –

इस काव्य संग्रह में अतीत के गौरव के प्रति कवि का सहज आदर और आकर्षण परिलक्षित होता है। इसके साथ ही इसमें वर्तमान परिवेश की नीरसता से त्रस्त मन की वेदना का परिचय भी मिलता है।

हुंकार-

इस काव्य संग्रह में कवि दिनकर जी अतीत के गौरव-गान की अपेक्षा वर्तमान दैत्य के प्रति आक्रोश प्रदर्शन की ओर अधिक उन्मुख जान पड़ते है |

रसवन्ती

रसवन्ती में कवि की सौन्दर्यान्वेषी वृत्ति काव्यमयी हो जाती है पर यह अन्धेरे में ध्येय सौन्दर्य का अन्वेषण नहीं, उजाले में ज्ञेय सौन्दर्य का आराधन है।

समाधेनी (1947 ईo )-

इस काव्य में दिनकर जी की सामाजिक चेतना स्वदेश और परिचित परिवेश की परिधि से बढ़कर विश्व वेदना का अनुभव कराती है , इसके साथ ही इसमें कवि के स्वर का ओज नये वेग से नये शिखर तक पहुँच जाता है |

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दिनकर जी की ‘काव्य ‘ रचना –

इन काव्य संग्रहों के अतिरिक्त दिनकर ने अनेक प्रबन्ध काव्यों की रचना भी की है, जिनमें ‘कुरुक्षेत्र’ (1946 ई.), ‘रश्मिरथी’ (1952 ई.) तथा ‘उर्वशी’ (1961 ई.) प्रमुख हैं। ‘कुरुक्षेत्र’ में दिनकर जी ने महाभारत के शान्ति पर्व के मूल कथानक का ढाँचा लेकर युद्ध और शान्ति के विशद, गम्भीर और महत्त्वपूर्ण विषय पर अपने विचार भीष्म और युधिष्ठर के संलाप के रूप में प्रस्तुत किये हैं | दिनकर के काव्य में विचार तत्त्व इस तरह उभरकर सामने पहले कभी नहीं आये | कुरुक्षेत्र’ के बाद उनके नवीनतम काव्य ‘उर्वशी’ में फिर हमें विचार तत्त्व की प्रधानता मिलती है | साहसपूर्वक गांधीवादी अहिंसा की आलोचना करने वाले ‘कुरुक्षेत्र’ का हिन्दी जगत में यथेष्ट आदर हुआ | उर्वशी’ जिसे कवि ने स्वयं ‘कामाध्याय’ की उपाधि प्रदान की है ने ‘दिनकर जी की कविता को एक नये शिखर पर पहुँचा दिया |

सन 1955 में दिनकर के काव्य में नीलकुसुम एक नया मोड़ बनकर आया | दिनकर जी का ये काव्य काव्यात्मक प्रयोगशीलता के प्रति आस्थावान था | इस काव्य में स्वयं प्रयोगशील कवियों को अजमाल पहनाने और राह पर फूल बिछाने की आकांक्षा उसे विव्हल कर देती है | इस काव्य में कवि की नवीनतम काव्यधारा से सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा तो स्पष्ट हो जाती है, पर यहाँ पर उसका कृतत्व साथ नहीं देता है | कवि के इस काव्य रचना के 6 बाद एक और रचना “उर्वशी ‘ प्रकाशित हुई जहां हिन्दी साहित्य में एक ओर इसकी आलोचना और दूसरी ओर मुक्तकंठ से प्रशंसा हुई | धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हुई और इस काव्य-नाटक को दिनकर की ‘कवि-प्रतिभा का चमत्कार’ माना गया |कवि ने इस रचना में वैदिक मिथक के माध्यम से देवता व मनुष्य, स्वर्ग व पृथ्वी, अप्सरा व लक्ष्मी द्वारा आध्यात्म के संबंधों का अद्भुत विश्लेषण किया है |
रे रोक युधिष्ठर को न यहाँ,
जाने दे उनको स्वर्ग धीर पर फिरा हमें गांडीव गदा,
लौटा दे अर्जुन भीम वीर – (हिमालय से)

क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो – (कुरूक्षेत्र से)

मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। – (रश्मिरथी से)” ….

एक क्रांतिकारी के रूप में रामधारी सिंह दिनकर –

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने हिंदी साहित्य में न सिर्फ वीर रस के काव्य को एक नयी ऊंचाई दी, बल्कि अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का भी सृजन किया | वर्तमान समय के मशहूर कवि प्रेम जनमेजय भी मानते है की दिनकर जी गुलाम भारत और आजाद भारत दोनों में अपनी कविताओं के जरिये क्रांतिकारी विचारों का विस्तार किया | जनमेजय ने ‘भाषा’ के साथ बातचीत में कहा, ‘आजादी के समय और चीन के हमले के समय दिनकर जी ने अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों के बीच राष्ट्रीय चेतना को बढ़ाया |

रामधारी सिंह दिनकर को मिले सम्मान और पुरस्कार –

दिनकर का पहला काव्यसंग्रह ‘विजय संदेश’ वर्ष 1928 में प्रकाशित हुआ | इसके बाद उन्होंने कई रचनाएं की | उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं ‘परशुराम की प्रतीक्षा’, ‘हुंकार’ और ‘उर्वशी’ हैं | दिनकर को वर्ष 1959 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया | दिनकर जी को पद्म भूषण से भी नवाजा गया था | सन 1972 में दिनकर को ज्ञान पीठ पुरस्कार से भी नवाजा गया था |

रामधारी सिंह दिनकर की की मृत्यु –

4 अप्रैल, 1974 को महान कवी रामधारी सिंह दिनकर का देहांत हो गया | दिनकर ने अपनी ज्यादातर रचनाएं ‘वीर रस’ में की | इस बारे में जनमेजय कहते हैं, ‘भूषण के बाद दिनकर ही एकमात्र ऐसे कवि रहे, जिन्होंने वीर रस का खूब इस्तेमाल किया | वह एक ऐसा दौर था, जब लोगों के भीतर राष्ट्रभक्ति की भावना जोरों पर थी | दिनकर ने उसी भावना को अपने कविता के माध्यम से आगे बढ़ाया | वह जनकवि थे इसीलिए उन्हें राष्ट्रकवि भी कहा गया | देश की आजादी की लड़ाई में भी दिनकर ने अपना योगदान दिया | वह बापू के बड़े मुरीद थे | हिंदी साहित्य के बड़े नाम दिनकर उर्दू, संस्कृत, मैथिली और अंग्रेजी भाषा के भी जानकार थे | वर्ष 1999 में उनके नाम से भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया |

अंतिम राय –

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हम आशा करते है की आज हमने आपको इस आर्टिकल के माध्यम से जो भी जानकारियाँ दी वो जानकारियाँ आपको पसदं आई होगी | आज आपने इस आर्टिकल के माध्यम से जो भी जानकारी हासिल की उसे आप अपने तक ही सिमित नहीं रखे बल्कि उसे दूसरों तक भी पहुचाएं , जिससे दुसरे लोग भी इसके बारें में जान सकें |
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